भगत सिंह का सम्पूर्ण जीवन परिचय | Bhagat Singh Biography [बदलाव]

दिल मैं आग लगा देने वाली इस महान क्रांतिकारी की ये जीवनी केवल हम किसी इंसान के बारे मैं जानने के लिए नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि एसलिए की किस तरहा एक 23 साल

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के नौजवान लड़के ने देश के लिए हस्ते हस्ते आपने जीवन को बलिदान कर दिया जी हां और कोई नहीं सहास और बलिदान की मूर्त जिन्होने भारत को अग्रेजो से आजाद कराने के लिए अपना पूरा जीवन देश की सेवा मैं लगा दिया भगत सिंह.

सोचने वाली बात ये हैं की कैसे एक 23 साल के लड़के का दिल इतना ज्यादा मजबूत हो गया की उसने फांसी के फंदे को चूमकर गले मैं पहन लिया इसकी सरूवात किस तरहा से हुई, किस तरहा भगत सिंह और उनके साथियो ने अग्रेजो को भगाने के लिए प्रयास किये, किस तरहा Bhagat Singh पकड़े गए और उनको फांसी दे दी गई और एक और महत्वपूर्ण बात, बोहोत से लोग कहते हैं की महात्मा गाँधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की क्या था सच सब आगे जानेगे.

भगत सिंह का जीवन परिचय | Bhagat Singh Biography in Hindi

भारत के इस महान बेटे का जन्म 28 सितम्बर 1907 मैं हुआ था. भगत सिंह का जन्म बंगा मैं हुआ था जो की अब पाकिस्तान मैं हैं. उनके पीता किसन सिंह थे जो खुद एक बोहोत बड़े क्रांतिकारी थे भगत सिंह की माता का नाम विद्यावती था जो की बोहोत ही ज्यादा साहसी महिला थी.

Bhagat Singh का पूरा परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ था और भगत सिंह के पिता और चाचा ग़दर नाम की पार्टी के मुख्य सदस्य थे. ग़दर पार्टी का केवल एक ही मकसद था अग्रेजो को भारत से निकालना. उस समय पूरे देश का माहौल बहोत ज्यादा बेकार था अग्रेज भारतीयो को बोहोत ज्यादा परेशान किया करते थे उन्हें मारा करते थे मन मर्जी का लगान लिया जाता था, किसी भी इन्सान को कोई भी काम को करने की आजादी नहीं थी देश हमारा ही था लेकिन फिर भी हमे कुछ करने की आजादी नहीं थी.

इससे भगत सिंह के मन पर बोहोत ज्यादा असर पड़ा और भगत सिंह ने देश जो आजाद कराने का फिसला किया.

भगत सिंह बचपन से ही पढने मैं बोहोत ज्यादा अच्छे थे भगत सिंह को किताबे पढ़ना बोहोत ज्यादा पसंद था उन्होंने अपनी स्कूल समय मैं ही बोहोत सी किताबे पढ़ डाली. भगत सिंह डी ऐ वी विद्यालय मैं पढ़ा करते थे जहा वो बोहोत से क्रांतिकारीयो के सम्पर्क मैं आए.

जलियावाला बाग़ की घटना से भगत सिंह बोहोत ज्यादा गुस्से मैं थे जिसने आग मैं घी का काम किया था और उनके अंदर के क्रांतिकारी को और बढ़ा दिया. हमे ये भी जानने की जरूरत हैं की जलियावाला बाग़ की घटना कैसे हुई.

जलियावाला बाग़ घटनाभगत सिंह की जीवनी

ये बात अप्रैल 1919 की हैं कई हजार लोग एक साथ काफी शांत तरीके से नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट के खिलाफ जलियावाला बाग़ मैं बैठे थे लेकिन जनरल डिअर ने गोले चलने का आदेश दे दिया और वह बैठे हजारो लोगो पर गोली चलानी सरु कर दी उसी मैदान के अंदर एक कुआ था जिसमे काफी लोग कूद गए थे अपनी जान बचने के लिए ऐसा कहते हैं की आज भी उस कुआ से खून आता हैं इतने ज्यादा लोगो ने उस कुआ मैं कूद कर अपनी जान दी थी. तोड़ी ही देर मैं पूरा मैदान लाशो का मैदान बन गया.

भगत सिंह आपने स्कूल से सीधे जलियावाला बाग़ चले गए 40 km दूर उन्होंने वहा पर पड़ा हुआ खून देखा फ़टे हुई कपड़े देखे और अपनी बोतल मैं मीठी भर कर घर पर आए और बोहोत देर तक चुप चाप अकेले बैठे रहे भगत सिंह की माता कहती हैं की क्या हुआ तुम खा गए थे फिर वो बोतल को निकालते हैं और कहते हैं की इस मीठी मैं हमारे लोगो का खून हैं मैं इनके बलिदान को बेकार नहीं जाने दूंगा, फिर भगत सिंह ने उस बोतल को जहा उनके भगवान का आला था वहा रख दिया और रोज उस मीठी की पूजा करने लगे.

जलियावाला बाग़ घटना के बाद गाँधी जी पंजाब जाकर हालात को सुधराना चाहते थे लेकिन अग्रेजो ने गाँधी जी को रोक दिया और कहा यदि तुम पंजाब गए तो तुम्हारी गरफ्तारी पक्की हैं जिससे गाँधी जी ने नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट छेड़ दिया जिसे सुनकर भगत सिंह बोहोत ज्यादा खुश हुए और गली गली मैं जाकर सबको कहने लगे की अब तो हम आजाद होने वाले हैं अब तो आजादी मिलनी ही मिलनी हैं, लेकिन सन 1922 मैं चोरी चोरा काण्ड ने सबको हीला कर रख दिया.

सन 1922 मैं बोहोत सारे लोग मिलकर शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे थे तभी पुलिस को लाठी चार्ज करने का आदेश मिलता हैं और फिर गोली चलने का आदेश मिलता हैं जिससे करीब 3 लोगो को गोली लगती हैं और उनकी मृत्यु हो जाती हैं जिससे भीड़ मैं गुस्सा आ जाता हैं और वो पुलिस वालो को मारना सरु कर देते हैं पुलिस वाले अपनी जान बचाने के लिए पुलिस थाने मैं भागते हैं और गुस्से मैं भीड़ पुलिस थाने को आग लगा देती हैं जिससे बोहोत सरे पुलिस कर्मचारी थाने मैं ही जल कर मर जाते हैं. जब ये बात गाँधी जी को पता चलती हैं तो वो पूरा नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट को रोक देते हैं की मेने किसी की जान लेने के लिए नहीं कहा था मेने शांति पूर्वक तरीके से आंदोलन करने को कहा था. जब ये बात भगत सिंह को पता चलती हैं की गाँधी जी ने नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट वापस ले लिया हैं तो बोहोत ज्यादा दुःख हुआ क्योकी भगत सिंह को लगता था की अब अग्रेज परेशान होकर भरत से चले जायँगे और हम पूरी तरह से आजाद होंगे. लेकिन सुब कुछ ख़त्म हो गया फिर भगत सिंह ने सोचा की अब सब कुछ आपने हाथ मैं लेने होगा तभी आजादी मिलेगी.

सन 1909 मैं अग्रजो ने मिंटो मोर्ले प्रस्ताव लाते हैं जिसमे भारत का कानून था और इस कानून को हर 10 बाद review करना था.

पहला रिव्यु 1919 मैं होता हैं दूसरा रिव्यु सन 1929 मैं होना होता हैं लेकिन सरकार बदलने के कारण 1927 मैं ही साइमन कमिसन आ गया.

साइमन कमिसन आता हैं और उसके अंदर एक भी भारतये नहीं था जिससे भगत सिंह और लाला लाजपत रॉय काफी ज्यादा गुसा होते हैं और लाला लाजपत रॉय और भगत सिंह साइमन कमिसन के खिलाफ आवाज उठाते हैं और साइमन वापस जाओ saiman go back का नारा लगाना सरु कर देते हैं जिससे सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस लाठी चार्ज करने का आदेश देते और लाला लाजपत रॉय भगत सिंह पर लाठिया पड़ती हैं जिससे लाला लाजपत रॉय को बोहोत ज्यादा चोट आती हैं और 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत रॉय की मृत्यु हो जाती हैं.

भगत सिंह लाला लाजपत की मृत्यु से बोहोत ज्यादा दुखी हुए और कहा की उनकी मृत्यु का बदला लेना होगा और फिर भगत सिंह ने सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस को मारने के लिए योजना बनाई इस योजना मैं भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, जय गोपाल, सुखदेव, राजगरु और दुर्गा देवी थी इस योजना के लीडर चंद्रशेखर आज़ाद थे. सबको पता था की वहा जाना इतना ज्यादा आसान नहीं था और यदि पकड़े गए तो फांसी पक्की हैं लेकिन सब ने मिलकर पूरी योजना बनाई. सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस की कार का नंबर 6728 था लेकिन इनसे गलती से किसी दूसरे पुलिस वाले की मृत्यु हो जाती हैं गोली लगते ही सब भागते हैं तो एक भारतये पुलिस कर्मचारी चंद्रशेखर आज़ाद का पीछा करता हैं तो चंद्रशेखर आज़ाद बोलते हैं की तुम भारतये हो और मैं तुम पर गोली नहीं चलाऊंगा लेकिन पुलिस वाला उनका पीछा करता हैं और चंद्रशेखर आज़ाद उस पर गोली चला देते हैं और DBA स्कूल से होते हुई वहा से भाग जाते हैं.

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भगत सिंह का जीवन परिचय (Biography of Bhagat Singh in Hindi) बोहोत ज्यादा जोश प्रदान करने वाली जीवनी हैं.

नॉट – दोस्तों एक बात सोचने वाली हैं की जब ये घटना घटी तो भगत सिंह केवल 20 साल के होंगे एक 20 साल के लड़के ने किस तरहा अपने साथयो के साथ मिलकर इस काम को अंजाम दिया. इस उम्र के लोग अपना करियर बनाने मैं और पढने मैं ध्यान देते हैं वही भगत सिंह ने सब कुछ त्याग कर भारत को आजादी दिलाने मैं लग गए.

अंगेजो ने पूरे ग्रुप को पकड़ने का आदेश दिया और हर जगहा उनकी जांच सरु हो गई फिर वहा से भागने के लिए 19 सितम्बर 1928 को भगत सिंह और सभी साथी दुगावती देवी के पास जाते हैं और उनकी मद्त मांगते हैं फिर भगत सिंह आपने बाल कटवाकर सूट पहनकर आपने आप को पूरी तरह बदल लेते हैं जिससे कोई उन्हें पहचान ना सके और दुगावती देवी भगत सिंह की पत्नी बनती हैं और सुखदेव उनके नौकर बनते हैं और रेलगाड़ी से कोलकाता पहोच जाते हैं और चंद्रशेखर आज़ाद पंडितो की एक टोली मैं मिल जाते हैं और और वहा से निकल कर भाग जाते हैं.

फिर भगत सिंह कोलकाता से आगरा जाते हैं और वही से आगे की आंदोलन को अंजाम देते हैं.

इसके बाद लार्ड इरविन ने दो बिल को प्रस्ताव रखा जिसमे पहले बिल मैं ये था की यदि अग्रेजो को यदि किसी पर सक भी हुआ तो वो उसे गरफ्तार कर लेंगे और दूसरे बिल मैं मजदूरी के वरूध था जिसमे मजदूरी से 20 घंटे काम करवाते थे जिसमे बच्चे और महिलाये भी सामील थी और वेतन भी बोहोत कम देते थे जिससे भगत सिंह बोहोत ज्यादा नाराज थे भगत सिंह और उनका समहू इस बिल को बंद करवाना चाहता था लेकिन गोरे उनकी बात कहा मानने वाले थे, तब भगत सिंह ने अग्रेजो तक अपनी बात पहोचाने के लिए एक योजना बनाई की हम लोग असेंबली मैं बम फेकेंगे लेकिन इस बम से किसी को कोई भी नुकसान नहीं होगा इसको ध्यान मैं रखते हुए कम ख़तरनाक बम बनाया गया और युक्ति बनाई गई की किस तरहा से बम फेके की किसी को कोई नुकसान ना हो और अग्रेजो तक हमारी बात भी पहोच जाए.

इस काम को अंजाम देने के लिए राम सरन दास और बटुकेश्वर दत्त को चुना गया था लेकिन सुख देव चाहते थे की भगत सिंह इस काम को अंजाम दे लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद ने इसके लिए मना किया और कहा की हम भगत सिंह को नहीं खो सकते यदि एक बार अंदर गए और बम फेक दिया तो पक्का पकड़ए जायँगे और फांसी पक्की हैं हम भगत सिंह को इतनी जल्दी नहीं खो सकते, लेकिन भगत सिंह नहीं माने और इस योजना को अंजाम देने के लिए तयार हो गए चंद्रशेखर आज़ाद ने बोहोत मना लेकिन भगत सिंह नहीं माने. भगत सिंह को पता था की अब वो सायद बच कर नहीं आ पायंगे और वो चाहते थे की वो पकड़े जाए और उनको फांसी हो जिससे लोगो के दलों मैं बलिदान की भावना जगे और हर घर से एक भगत सिंह आगे आए.

मुझे भगत सिंह की सोच को देख कर बोहोत ज्यादा अचम्बा होता हैं की किस तरहा एक लड़का जिसे पता हैं की अब वो वापस नहीं आएगा वहा जाने के लिए तयार हो जाते हैं एसलिए भगत सिंह का जीवन परिचय बोहोत ज्यादा ख़ास हैं.

फिर Bhagat Singh आपने साथी के साथ असेंबली मैं गए शूट पहन कर जिससे उनको कोई पहचान ना सके और असेंबली मैं वहा बम फेकते हैं जहा कोई नहीं था चारो और धुआँ धुआँ हो जाता हैं और लोग बहार की तरफ भागने लगते हैं फिर भगत सिंह एक और बम फेकते हैं जहा को नहीं होता हैं जिससे किसी को भी चोट नहीं आती हैं. इसके बाद भगत सिंह आपने साथी के साथ भाग सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योकी वो देश के लिए कुरबान होना चाहते थे. असेंबली भगत सिंह को चारो और से घेर लिए और भगत सिंह ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया भगत सिंह के पास एक बंदूक भी थी जो उन्होंने पुलिस को दे दी. और दोनों को अलग अलग पुलिस थाने मैं ले जाया गया भगत सिंह को चांदनी चौक थाने मैं ले जाया गया.

जब सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद को पता चलता हैं की भगत सिंह पकड़े गए तो उन्हें बोहोत ज्यादा दुःख होता हैं. इसके बाद भगत सिंह की जमानत के लिए 70 हजार मांगे जाते हैं जो की उस समय बोहोत बड़ी बात थी दोस्तों ये कोई आज या कल की बात नहीं हैं ये आज से लगभग 90 साल पहले की हैं इतने पैसे को इंतजाम नहीं हो पाता हैं पुलिस बार बार भगत सिंह के पास जाती हैं और कहती हैं की तुम सब कुछ सच सच बता दो की तुम्हारे साथ कौन कौन हैं, तुम्हारी अगली क्या योजना हैं लेकिन भगत सिंह कहा कुछ बताने वाले थे. अग्रेजो को समझ मैं आ गया था की भगत सिंह बड़ी मछली हैं उनको पकड़ लो बाकी धीरे धीरे सबको पकड़ लेंगे होता भी ऐसा ही हैं धीरे धीरे सब पकड़े जाते हैं.

फिर भगत सिंह और उनके साथियो को मिआँवली जेल पंजाब ले जाया गया वहा की हालत बोहोत ज्यादा खराब थी रोटी को केकरोच और चूहे कहा रहे थे, शौचालय के बराबर मैं ही खाना बनाया जाता था बोहोत ज्यादा बेकार खाना दिया जाता था और पढने के लिए अखबार नहीं दिया जाता था क्योकी भगत सिंह को पढने का बोहोत ज्यादा सोख था तब भगत सिंह ने कहा की मैं जब तक कुछ भी खाऊंगा जब तक तुम हमारी मांगे नहीं पूरी कर लेते. भगत और उनके साथयो ने 96 दिन तक उपवास रखा जो की एक विश्व रिकॉर्ड हैं इस दौरान भगत सिंह और उनके साथयो को बोहोत ज्यादा परेशान किया जाता था उन्हें पीटा जाता था, नाक मैं नलकी लगाकर दूध डालने की कोसिस करते थे, ठंडो मैं बर्फ पर लेटकर हंटर से मारा करते थे लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपना उपवास नहीं तोडा भगत सिंह और उनके साथयो का वजन बोहोत ज्यादा घट गया था, लेकिन 13 सितम्बर 1929 को दास की मृत्यु हो जाती हैं उपवास के कारण और अग्रेज भगत सिंह के आगे झुक जाते हैं और उनकी सभी शर्तो को मान लिया जाता हैं.

अग्रेज इस मुकदमे को ज्यादा आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे क्योकी उन्हें पता था की यदि ये छूट गए तो हमारे खिलाफ आन्दोनल करेंगे एसलिए भगत सिंह और उनके साथयो को फ़साने के लिए बेवजूद मुकदमे चलाये गए करीब 460 गव्हा लाये गए अग्रेजो का केवल एक ही मकसद था की भगत और उनके साथी बचकर नहीं जाने चाहिए लेकिन भगत सिंह के 5 साथी दगा करते हैं और भगत सिंह और उनके साथयो के खिलाफ गवाई देते हैं. जिसमे जय गोपाल को भुलाया जाता हैं और वो अपनी मुछो को ताव देता हुआ बतात हैं की saunder की मृत्यु भगत सिंह, सुखदेव और राज गरु ने की जिससे भगत सिंह के साथी काफी ज्यादा नाराज हो जाते हैं और गद्दार गद्दार कहते हैं.

जज कहता हैं की कैदियों को चिल्लाने का कोई भी हक नहीं हैं और हतकडी लगाने का आदेश दिया जाता हैं हतकडी लगाने वो ऐसे नहीं आते थे की हाथ पीछे किये और हथकड़ी लगा दी पहले बोहोत पूरी तरहा मारा जाता था फिर घसीट कर हतकडी लगाते थे जिससे भगत सिंह बोहोत ज्यादा नाराज हुए और उन्होंने कहा की यदि उनको हतकडी लगाई तो वो अदालत मैं नहीं आयंगे. जज एसलिए हतकडी लगवाते थे क्योकी भगत सिंह और उनके साथी अदालत मैं ये गाना गाते हुए आते थे. सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है.

हंस राज वोहरा भी भगत सिंह के खिलाफ गवाई देते हैं हंस राज वोहरा की गवाई से भगत सिंह को बोहोत ज्यादा दुःख होता हैं क्योके भगत सिंह हंस राज वोहरा को अपना छोटा भाई मानते थे उनके इस ब्यान से भगत सिंह को बोहत ज्यादा दुखी कर दिया.

फिर वो दिन आता हैं जब भगत सिंह और उनके साथयो को फांसी की सजा सुनाई जाती हैं 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव , राज गरु को फांसी, 7 लोगो को उम्र कैद और बाकियो को 7 साल और 5 साल की सजा होती हैं.

भगत सिंह के पिता भगत सिंह के पास आते हैं और कहते हैं की मैं तुम्हे बचा लूंगा भले ही मुझे अपना सब कुछ बेचना पड़े लेकिन इस पर भगत सिंह नाराज हो गए और आपने लिए किसी भी तरहा की मद्त के लिए मना कर दिया.

भगत सिंह, सुखदेव और राजगरु तीनो की फांसी का दिन 29 मार्च 1931 रखा गया था लेकिन अग्रेजो को डर था की जब तीनो को फांसी लगाए जायगी तो लोग जेल ही ना तोड़ दे इसके लिए अग्रेज 6 दिन पहले ही 23 मार्च 1931 की सुबहा तीनो को फांसी लगाने का आदेश देते हैं.

भगत सिंह आपने आखरी दिनो मैं लेनिन की किताब पढ़ रहे थे जेलर भगत सिंह के पास आया और बोला की तुम्हारा समय आ गया हैं भगत सिंह ने बोला देख नहीं रहे हो अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा हैं फिर वो अपनी किताब को पढ़कर उनके साथ चले जाते हैं और जैसे ही तीनो को ले जाया जाता हैं तभी इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगने सरु हो जाते हैं. जब तीनो को ले जाया जा रहा था तो भगत सिंह, सुखदेव और राज गरु ये गाना गाते हुए जाते हैं.
कभी वो दिन भी आएगा,
जब हम आज़ाद होंगे.
यह अपनी ज़मीन होगी,
यह अपना आस्मां होगा .
शहीदों की चिताओं पर
लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का
एहि नाम -ओ -निशान होगा!

फिर तीनो एक दूसरे से गले मिलते हैं और कहते हैं की फिर मिलंगे वो मंजर बोहोत ज्यादा दुखी कर देने वाला होता हैं सब सोच रहे थे की ऐसा क्यों हो रहा हैं क्यों इन तीनो की फांसी नहीं रोकी जा रही हैं. इसके बाद भगत सिंह ने फांसी के फंदे को चूमा गले मैं पहन लिया और उनको फांसी हो गई काफी देर तक वो फांसी पर लटके रहे और फिर नीचे उतरा गया और पहचान करने के लिए एक पुलिस कर्मचारी को बुलाया गया लेकिन वो इन लोगो की फांसी से इतना ज्यादा दुखी हो गया था की उसने बॉडी को पहचान के लिए मना कर दिया और उसको नौकरी से निकाल दिया और फिर दूसरे पुलिस कर्मचारी को बुलाया जाता हैं और जो इन तीनो की पहचान करता हैं.

इसके बाद अग्रेज सोचते हैं की यदि ये बात बहार लोगो को पता चल गई की भगत सिंह को फांसी हो गई हैं तो वो शायद जेल को आग ना लगा दे. फिर अग्रेज भगत सिंह, सुखदेव और राजगरु तीनो के शरीर के टुकड़े करवा कर बोरे मैं भरकर जेल के पीछे के रस्ते से नदी के किनारे फेक आते हैं कुत्ते उनके शरीर को नोचते हैं फिर गांव वालों की निगाह वहा जाती हैं जब गांव वाले खोज करते हैं तो पता चलता हैं की ये तो भगत सिंह, राज गरु और सुखदेव की लाशे हैं इतना पता चलते ही पूरे देश मैं आक्रोश फेल जाता हैं और जिसके कारण 1940 मैं उधम सिंह जनरल डायर को गोली मार देता हैं और फिर हालात सुधरते जाते हैं और फिर आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो जाता हैं.

भारत की आजादी मैं भगत सिंह का बोहोत बड़ा हाथ था यदि भगत सिंह ना होते तो शायद आज भी हम गुलाम होते भगत सिंह के जीवन परिचय को इतने कम समय मैं बताना बोहोत ज्यादा मुश्किल हैं क्योकी भगत सिंह एक महान इन्सान थे, आज जब भी सबसे पड़े देश भक्त की बात आती हैं तो सबसे पहले भगत सिंह का नाम मन मैं आता हैं. वैसे तो भगत सिंह के बारे मैं बोहोत सी बाते और हैं जो मेरे दिल मैं हैं की आपसे साझा करू लेकिन ये मेरा वादा हैं आपसे की भगत सिंह की कुछ अनसुनी बाते मैं आपके सामने लेकर आऊंगा यदि आप भी सच्चे देश भक्त हो और भगत सिंह की जीवनी (Bhagat Singh Biography in Hindi) आपको अच्छी लगी तो इसे जरूर साझा कर लोगो को भगत सिंह के बारे मैं बताए.

गाँधी जी ने भगत सिंह को बचना चाहा या नहीं?

बोहोत से लोग कहते हैं की महात्मा गाँधी ने भगत सिंह और उनके साथयो को बचाया नहीं क्योकी जब भगत सिंह, सुखदेव और राज गरु को फांसी की सजा दी गई तब सब लोग जानते थे की केवल एक गाँधी जी हैं जो भगत सिंह और उनके साथयो को बचा सकते हैं. महात्मा गाँधी ने वाइसराय को पत्र भी लिखा वाइसराय ने भी जवाब दिया की पेक्ट वापस ले लो हम फांसी रोक देंगे लेकिन गाँधी जी ने पेक्ट वापस नहीं लिया.

ऐसा नहीं था की गाँधी जी ने भगत सिंह को बचाने की कोसिस नहीं की लेकिन बोहोत ज्यादा कोसिस नहीं की क्योकी सायद गाँधी जी भगत सिंह की विचार धारा से सहमत नहीं थे भगत सिंह गर्म दल के थे और गाँधी जी नरम दल के और दोनों की सोच मैं बोहोत ज्यादा अन्तर था. भगत सिंह कहते थे की पुण्ड स्वराज लेकिन वही गाँधी जी कहते थे की कुछ नहीं से तो कुछ होना ही अच्छा हैं आप हमे आजादी दे दो लेकिन कानून आपका रहेगा यही विचारो मैं अंतर कर कारण गाँधी जी ने सायद इतनी ज्यादा कोसिस नहीं की.
सुभाष चंद्र बोष सिंह के सपोर्ट मैं बोहोत ज्यादा थे उन्होंने तो ये भी कहा था की गाँधी जी को पेक्ट तोड़ कर इन तीनो को बचा लेना चाहिए.

इसपर आप लोगो के क्या विचार हैं कृपया कर कमेंट बॉक्स मैं बताये.

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